

सुख और समृद्धि: पुराणों और मान्यताओं के अनुसार, करवे में भरा जल और सामग्री परिवार में सुख-शांति और पति की लंबी उम्र की कामना के लिए समर्पित होती है।
पति के हाथों जलपान: चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद, महिलाएं छलनी से चांद और फिर पति का चेहरा देखकर पति के हाथों से इसी करवे का जल पीकर अपना निर्जला व्रत खोलती हैं।
बच्चों को जल देना: कई जगहों पर व्रत के बाद करवे के बचे हुए पवित्र जल को बच्चों को पिलाया जाता है, जिससे उनकी सेहत और लंबी उम्र की मान्यता जुड़ी होती है।
विसर्जन या संभालना : पूजा के बाद मिट्टी के करवे को इधर-उधर नहीं फेंकना चाहिए। इसे आप किसी पवित्र नदी या तालाब में विसर्जित कर सकते हैं, या फिर किसी पौधे (जैसे तुलसी) के पास रख सकते हैं।