
परगट सिंह ने कहा – इस रफ्तार से राज्य का कर्ज हो जाएगा 5 लाख करोड़ रुपए पार
जालंधर : पंजाब के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और विधायक परगट सिंह ने एक बार फिर से पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार की आर्थिक नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने 2500 करोड़ रुपए का नया कर्ज लेकर दो महीने से कम समय में पंजाब को 6500 करोड़ रुपए के कर्ज के नीचे दबा दिया है। यह नया कर्ज सरकार की वित्तीय नाकामी और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि यह केवल वित्तीय आंकड़ों का मामला नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पंजाब के विकास, रोजगार और आम जनता की जिंदगी पर पड़ रहा है।
परगट सिंह ने कहा कि आंकड़ों और जानकारी के मुताबिक अप्रैल में 4000 करोड़ रुपए कर्ज ले चुकी है और अब इसी महीने 2500 करोड़ रुपए कर्ज और लिया जा रहा है। दावा यह भी किया जा रहा है कि अगले महीने जून में 2500 करोड़ रुपए का और कर्ज लेने की तैयारी है। उन्होंने कहा कि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार ने वर्ष 2026-27 के दौरान करीब 40 हजार करोड़ रुपए तक का नया कर्ज लेने की योजना बना रखी है।
परगट सिंह ने कहा कि बार-बार लिए जा रहे कर्ज और पंजाब की वित्तीय स्थिति को लेकर मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान और वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। सरकार स्पष्ट करे कि हाल ही में लिए गए हजारों करोड़ रुपए के कर्ज का इस्तेमाल आखिर किन विकास कार्यों में किया गया है। यदि यह राशि केवल सब्सिडी और पुराने कर्ज चुकाने में खर्च हो रही है तो यह राज्य को और गहरे आर्थिक संकट में धकेल देगा।
परगट सिंह ने आरोप लगाया कि पंजाब सरकार हर साल नया कर्ज लेकर पुराने कर्ज और ब्याज की भरपाई कर रही है। नया लोन लेने के बाद उसका बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज और ब्याज चुकाने में खर्च हो जाता है। यदि यही स्थिति जारी रही तो पंजाब गंभीर आर्थिक संकट की ओर बढ़ जाएगा। पंजाब पहले से ही भारी कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य पर कुल कर्ज 4 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है और यदि इसी तरह लगातार कर्ज लिया जाता रहा तो यह आंकड़ा जल्द ही करीब 5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।
उन्होंने कहा कि आज पंजाब के हर व्यक्ति पर औसतन 1.25 लाख रुपए से अधिक का कर्ज है और आने वाले समय में यह बोझ और बढ़ेगा। राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों की तनख्वाह, पेंशन, बिजली सब्सिडी और पुराने कर्ज के ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है। कई वित्तीय रिपोर्टों के अनुसार लगभग 90 प्रतिशत बजट इन्हीं स्थायी खर्चों में खत्म हो जाता है, जिससे विकास कार्यों और बुनियादी ढांचे के लिए बहुत कम राशि बचती है। जरूरत पड़ने पर इस मुद्दे को विधानसभा से लेकर जनता के बीच और हर लोकतांत्रिक मंच पर उठाया जाएगा।