पांचवे दिन : गोवर्धन पूजा ब्रज क्षेत्र में प्रकृति पूजा की जीवंत परंपरा : पूज्य श्री राधा बिहारी शरण जी महाराज

by Sandeep Verma
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जालंधर : खिंगरा गेट में चल रही पांचवे दिन श्रीमद् भागवत कथा में पधारे पूज्य श्री राधा बिहारी शरण जी महाराज ने अपने मुख से प्रवचन करते हुए बताया कि गोवर्धन पूजा की कहानी श्रीमद्भागवत पुराण से ली गई है, जिसमें इंद्र के क्रोध से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाने का उल्लेख है। यह कथा प्रकृति की रक्षा, भक्ति और अहंकार के त्याग का संदेश देती है। ब्रज क्षेत्र में यह त्योहार दीपावली के एक दिन बाद मनाया जाता है, जहां अन्नकूट, परिक्रमा और गोबर से पर्वत की आकृति बनाकर उसकी पूजा की जाती है। लेकिन, श्रीकृष्ण ने कहा कि वर्षा और समृद्धि प्रकृति से आती है, न कि देवताओं के क्रोध से। उन्होंने गोवर्धन पूजा का आह्वान किया। क्रुद्ध होकर इंद्र ने मूसलाधार वर्षा की, लेकिन कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर सभी को बचाया। इस तरह, यह श्रीकृष्ण की यह लीला अहंकार के त्याग और प्रकृति रक्षा का प्रतीक बन गई। ब्रज में आज भी यह कथा सुनाई जाती है और गोवर्धन को “गिरिराज जी” के रूप में पूजा जाता है। श्रीकृष्ण की लीलाओं को याद करते हुए, आज भी मथुरा-वृंदावन में विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जो पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

कल के कार्यक्रम की जानकारी देते हुए : श्री लाडली दास जी ने बताया कि कल बड़े धूमधाम से हमारे ठाकुर जी की शादी उत्सव मनाया जाएगा और आप को बता दें कि महारास का अर्थ है आत्मा और परमात्मा का मिलन और आध्यात्मिक प्रेम का परम अनुभव। यह भगवान कृष्ण और गोपियों की रासलीला का वह विशेष रूप है, जिसमें श्री कृष्ण ने प्रत्येक गोपी के साथ नृत्य करने के लिए अलग-अलग स्वरूप धारण किए थे। यह शारीरिक वासना से परे, भक्ति में एक गहन और दिव्य आनंद का प्रतीक है

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